जैन धर्म में विवाह को भोग-विलास नहीं बल्कि एक पवित्र धर्म-संस्कार माना जाता है, जिसमें दो जीवात्माएं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के नैतिक मूल्यों पर आधारित गृहस्थ जीवन में प्रवेश करती हैं। जैन विवाह की रस्में अत्यंत सात्विक, मर्यादित और जिनेंद्र प्रभु के सानिध्य में संपन्न होती हैं।
1. लग्न पत्रिका लेखन (Lagan Lekhan)
विवाह की पहली और सबसे महत्वपूर्ण औपचारिक रस्म लग्न लेखन है। इसमें वर और वधू दोनों पक्षों के परिवार, वरिष्ठजन और पंडित जी की उपस्थिति में विवाह की शुभ तिथि, मुहूर्त और लग्न का निर्धारण करते हैं।
- श्री नवकार महामंत्र के मंगलाचरण के साथ लग्न पत्रिका लिखी जाती है।
- पत्रिका में वर-वधू का नाम, उनके माता-पिता, गोत्र एवं कुल का उल्लेख होता है।
- यह पत्रिका चांदी या शुभ वस्त्र में लपेटकर मिठाई व श्रीफल के साथ वर पक्ष को भेजी जाती है।
2. सगाई एवं रोली-तिलक (Sagai / Tilak)
लग्न लेखन के पश्चात सगाई (तिलक) की रस्म होती है। वधू पक्ष के परिजन वर के घर जाकर उन्हें नारियल (श्रीफल), मिष्ठान्न और उपहार भेंट करते हैं। इस अवसर पर वर के माथे पर कुमकुम-अक्षत का तिलक लगाकर रिश्ते की सार्वजनिक स्वीकृति दी जाती है।
3. मंडप मुहूर्त एवं माता की चौक (Mandap Muhurat)
विवाह से एक-दो दिन पूर्व दोनों घरों में मंडप की स्थापना की जाती है। इस दिन घर में शांति विधान, नवकार महामंत्र का जाप और कुलदेवी/जिनवाणी पूजा की जाती है। परिवार की महिलाएं पारंपरिक मांगलिक गीत गाती हैं।
4. बारात आगमन एवं तोरण वंदन
विवाह के दिन वर पक्ष गाजे-बाजे और गरिमा के साथ विवाह स्थल पर पहुंचता है। वधू पक्ष आदर-सत्कार के साथ बारात का स्वागत करता है जिसे अगवानी कहा जाता है। वर द्वारा मुख्य द्वार पर तोरण छुआ जाता है, जो विजय और शुभता का प्रतीक है।
5. वरमाला (Jaimala)
सजे-धजे विवाह मंडप में वर और वधू एक-दूसरे को सुगंधित पुष्पों की माला पहनाते हैं। यह दोनों के बीच पारस्परिक सम्मान, प्रेम और आजीवन समर्पण का प्रतीक है।
6. मंगल फेरे एवं ग्रंथि बंधन (Phere & Granthi Bandhan)
जैन विवाह का सबसे पावन क्षण मंगल फेरे है। जैन परंपरा में यह फेरे प्रायः भगवान जिनेंद्र की प्रतिमा, जिनवाणी या पवित्र मंगल दीपक के समक्ष लिए जाते हैं।
- ग्रंथि बंधन: वर के दुपट्टे और वधू की चुनरी की गांठ बांधी जाती है, जो सात जन्मों के आत्मिक संबंध का द्योतक है।
- चार मंगल फेरे: जैन धर्म में चार पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—के प्रतीक रूप में चार फेरे लिए जाते हैं। प्रथम तीन फेरों में वर आगे रहता है और चौथे फेरे में वधू आगे चलती है।
- प्रतिज्ञाएं: वर और वधू जिनेंद्र भगवान को साक्षी मानकर एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान रहने, सात्विक आचरण अपनाने और धर्म-मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।
7. महा आशीर्वाद एवं विदाई
फेरे पूर्ण होने के पश्चात दोनों परिवारों के वरिष्ठ जन, साधु-संतों (यदि उपलब्ध हों) या विद्वान पंडित जी नवदंपति पर पीले अक्षत और केसर छिड़ककर मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इसके बाद भावुक वातावरण में वधू की ससुराल के लिए विदाई होती है।